जब नगर परिषद अध्यक्ष और उनका परिवार ही सरकारी भूमि पर कब्जे के आरोपों में घिरें, तो आम जनता का क्या?

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दैनिक आचरण भोपाल 

समाचार 

जब नगर परिषद अध्यक्ष और उनका परिवार ही सरकारी भूमि पर कब्जे के आरोपों में घिरें, तो आम जनता का क्या?

नरवर। नगर परिषद नरवर में सरकारी भूमि के कथित अतिक्रमण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 

स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार खसरा नंबर 1728 सहित आसपास के कुछ खसरे राजस्व अभिलेखों में पहाड़/शासकीय भूमि के रूप में दर्ज बताए जा रहे हैं,,,,। 

लेकिन आरोप है कि इन जमीनों पर कथित रूप से कब्जा कर मिल का संचालन किया जा रहा है। 

यदि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि वास्तव में शासकीय दर्ज है और वहां बिना वैध अनुमति के व्यावसायिक गतिविधि संचालित हो रही है,

 तो यह पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करता है।

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि आरोप नगर परिषद अध्यक्ष और उनके परिवार से जुड़े होने की बात कही जा रही है। 

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस नगर निकाय पर शहर में नियमों के पालन और अतिक्रमण रोकने की जिम्मेदारी है, 

उसी के शीर्ष पद से जुड़े लोगों पर सरकारी जमीन के इस्तेमाल के आरोप लगें तो प्रशासन इस मामले में कितनी निष्पक्षता से कार्रवाई करेगा?

स्थानीय लोगों का कहना है कि 

नगर निकाय की आबादी और आवासीय क्षेत्र से दूर मिल जैसी गतिविधियों का संचालन किया जाना चाहिए, ताकि प्रदूषण, यातायात और अन्य संभावित समस्याओं से नागरिकों को परेशानी न हो। 

ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि संबंधित मिल को किस आधार पर संचालित किया जा रहा है और उसके लिए भूमि उपयोग, भवन, प्रदूषण, नगर निकाय तथा अन्य आवश्यक विभागीय अनुमतियां प्राप्त हैं या नहीं।

राजस्व रिकॉर्ड की जांच से खुलेगा पूरा सच


इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राजस्व विभाग की हो सकती है। प्रशासन यदि खसरा नंबर 1728 तथा आसपास के संबंधित खसरों का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से जांचे, मौके का सीमांकन कराए और वर्तमान कब्जे की स्थिति का मिलान राजस्व अभिलेखों से करे, तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

यदि जांच में भूमि शासकीय पाई जाती है और उस पर बिना वैधानिक अनुमति के कब्जा अथवा व्यावसायिक उपयोग साबित होता है, तो नियमानुसार जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई का सवाल उठेगा। वहीं यदि संबंधित पक्ष के पास वैध पट्टा, अनुमति या अन्य कानूनी दस्तावेज मौजूद हैं, तो प्रशासन को उन्हें भी सार्वजनिक जांच के दायरे में लाकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

अध्यक्ष से जुड़े होने के कारण बढ़ी जिम्मेदारी

मामला नगर परिषद अध्यक्ष या उनके परिवार से जुड़ा होने के कारण प्रशासन के सामने निष्पक्ष जांच की बड़ी चुनौती है। आम जनता का सवाल है कि क्या सरकारी भूमि पर कब्जे के आरोपों की जांच उसी स्थानीय तंत्र के भरोसे छोड़ी जाएगी, जिस पर अतिक्रमण और नियमों के पालन की जिम्मेदारी है?

नागरिकों की मांग है कि जिला प्रशासन स्वतंत्र राजस्व अधिकारियों की टीम गठित कर मौके का निरीक्षण, सीमांकन और दस्तावेजों की जांच कराए। साथ ही मिल संचालन से संबंधित सभी अनुमतियों की भी जांच हो।

फिलहाल यह मामला आरोपों और उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और सरकारी अभिलेखों के सत्यापन के बाद ही सामने आएगा। लेकिन यदि सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय होगा।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह खसरा नंबर 1728 और संबंधित भूमि का सीमांकन कराकर पूरे मामले की सच्चाई जनता के सामने कब तक रखता है।

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