दैनिक आचरण भोपाल
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शिवपुरी के मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों पर नियमों अनदेखी के गंभीर सवाल। पार्किंग गायब, डॉक्टरों की सूची नदारद!
शिवपुरी। जिले में संचालित हो रहे निजी मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों को लेकर अब व्यवस्थाओं और नियमों के पालन पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
शहर में कई अस्पताल ऐसे बताए जा रहे हैं, जहां बड़ी संख्या में मरीज और उनके परिजन प्रतिदिन पहुंचते हैं,
लेकिन अस्पताल परिसर में पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था दिखाई नहीं देती।
इसके कारण अस्पतालों के आसपास सड़क किनारे वाहनों की कतार लगने से यातायात व्यवस्था प्रभावित होने की स्थिति बनती है।
सवाल यह है कि जिन अस्पतालों को मरीजों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर अनुमति एवं मान्यता दी जाती है,
वहां बुनियादी व्यवस्थाओं की जांच आखिर कितनी गंभीरता से की जाती है?
सबसे बड़ा सवाल पार्किंग व्यवस्था को लेकर है।
मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज, उनके परिजन, एंबुलेंस और अन्य वाहन पहुंचते हैं। ।
ऐसे में अस्पतालों के पास पर्याप्त और व्यवस्थित पार्किंग होना बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि किसी अस्पताल के पास स्वीकृत या निर्धारित पार्किंग व्यवस्था नहीं है,
तो संबंधित विभाग द्वारा निरीक्षण के दौरान इस बिंदु की जांच की गई थी या नहीं, यह सार्वजनिक जांच का विषय बन गया है।
इसी तरह अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों की जानकारी को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
अस्पताल में कौन-कौन से विशेषज्ञ डॉक्टर सेवाएं दे रहे हैं? कौन डॉक्टर एमबीबीएस हैं और कौन किस विशेषज्ञता में पंजीकृत हैं?
उनकी डिग्री, पंजीयन और निर्धारित समय की जानकारी मरीजों को आसानी से उपलब्ध है या नहीं?
अस्पताल परिसर में चिकित्सकों की स्पष्ट सूची और उनकी योग्यता प्रदर्शित की गई है या नहीं—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी है।
मरीज के लिए डॉक्टर की पहचान और योग्यता जानना उसका अधिकार है।
यदि अस्पताल अपने यहां उपलब्ध चिकित्सकीय सेवाओं का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं करते हैं, तो स्वास्थ्य विभाग को इसकी जांच करनी चाहिए।
मान्यता देने से पहले क्या हुआ था भौतिक निरीक्षण?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठता है।
किसी निजी अस्पताल को अनुमति, पंजीयन या अन्य स्वीकृतियां देने से पहले क्या मौके पर जाकर भौतिक निरीक्षण किया गया?
निरीक्षण के दौरान पार्किंग, भवन की क्षमता, अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन व्यवस्था, चिकित्सकों की उपलब्धता, नर्सिंग स्टाफ, उपकरण और अन्य आवश्यक सुविधाओं की जांच की गई थी या केवल दस्तावेजों के आधार पर प्रक्रिया पूरी कर दी गई?
यदि निरीक्षण रिपोर्ट में पार्किंग और अन्य सुविधाएं मौजूद बताई गई हैं, लेकिन मौके पर स्थिति अलग है, तो यह गंभीर जांच का विषय होना चाहिए।
अधिकारियों और अस्पताल संचालकों की मिलीभगत के आरोपों की हो निष्पक्ष जांच
निजी अस्पतालों के संचालन को लेकर आम लोगों के बीच यदि अधिकारियों और अस्पताल संचालकों की मिलीभगत जैसे आरोप सामने आ रहे हैं,
तो इन्हें केवल आरोप मानकर नजरअंदाज करने के बजाय दस्तावेजों और मौके की जांच के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
हालांकि, किसी अधिकारी या अस्पताल संचालक को बिना प्रमाण भ्रष्टाचार का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। इसलिए पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है।
जांच में यह देखा जाना चाहिए कि अस्पताल को किस विभाग से कौन-कौन सी अनुमति मिली, निरीक्षण कब हुआ,
निरीक्षण टीम में कौन अधिकारी शामिल थे, निरीक्षण रिपोर्ट में क्या सुविधाएं दर्ज की गईं और वर्तमान में मौके पर वास्तविक स्थिति क्या है।
सरकार के नियमों पर भी उठ रहे सवाल
यदि किसी अस्पताल के दस्तावेजों में सभी सुविधाएं पूरी दिखाई गई हैं,
लेकिन मौके पर वे सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो
यह सवाल सिर्फ अस्पताल प्रबंधन तक सीमित नहीं रहता। ऐसी स्थिति में संबंधित निरीक्षण और अनुमति प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
शिवपुरी जिले में संचालित सभी निजी मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों की संयुक्त भौतिक जांच कराई जाए।
प्रत्येक अस्पताल की पार्किंग क्षमता, चिकित्सकों की सूची, डॉक्टरों की डिग्री एवं पंजीयन, फायर सेफ्टी, आपातकालीन सेवाएं, भवन अनुमति और अन्य अनिवार्य व्यवस्थाओं का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
सबसे बड़ा सवाल—मरीजों की सुरक्षा या कागजों की खानापूर्ति?
आज जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग केवल कागजी रिकॉर्ड पर भरोसा न करे,
बल्कि अस्पतालों की वास्तविक स्थिति की जांच करे।
यदि नियमों का पालन हो रहा है तो अस्पताल संचालकों को भी जांच से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
लेकिन यदि कहीं नियमों की अनदेखी सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
शिवपुरी की जनता अब जवाब चाहती है—मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों को अनुमति देने से पहले क्या सभी नियमों की जांच वास्तव में हुई थी?
यदि हुई थी तो पार्किंग और चिकित्सकों की सार्वजनिक जानकारी जैसी व्यवस्थाओं पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
और यदि नियमों में कमी है तो अब तक जिम्मेदार अधिकारियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
यही सवाल अब स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं।
