दैनिक आचरण भोपाल
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100 करोड़ डूबे, सड़कें टूटीं, मिट्टी-पत्थर बिके और साहब बोले
शिवपुरी।
जनता की गाढ़ी कमाई के 100 करोड़ से ज्यादा रुपये जमीन में गाड़ने के बाद सिस्टम ने ईमानदारी से स्वीकार कर लिया कि शिवपुरी का महत्वाकांक्षी सीवर प्रोजेक्ट फेल हो गया है।
2011-12 में 59 करोड़ से 69 करोड़ की लागत से शुरू हुआ ये प्रोजेक्ट आज 111 से 113 करोड़ खा चुका है,
95 किमी में से आज भी 55 किमी लाइन की टेस्टिंग तक पूरी नहीं हुई है।
21 महीने में पूरा होने वाला प्रोजेक्ट 15 साल में भी अधूरा है।
इसे विकास नहीं, भ्रष्टाचार की किस्तों में चलने वाली सरकारी EMI कहिए।
और इस फेल प्रोजेक्ट के साइड इफेक्ट्स का क्या?
करोड़ों की सड़कें जो कागज पर ही दोबारा बनीं: सीवर के नाम पर पूरे शहर को खोदा गया।
अच्छी-भली डामर रोड थीं, उन्हें उखाड़ कर गड्ढों में बदल दिया गया।
ठेकेदार गए, अधिकारी बदले, लेकिन वो सड़कें आज तक नहीं सुधरीं।
जनता आज भी उन्हीं गड्ढों में कमर दर्द और सर्वाइकल का इलाज करवा रही है।
जमीन से निकली मिट्टी और पत्थर का 'काला सोना': कहते हैं
शिवपुरी की जमीन खोद कर ठेकेदारों ने लाखों ट्रॉली मिट्टी और पत्थर बेच कर अपनी अलग अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली।
सीवर लाइन तो नहीं बिछी, लेकिन कईयों के फार्म हाउस और प्लॉट जरूर समतल हो गए।
डेढ़ दशक तक जनता ने जो झेला,
उसका क्या? 13-15 साल से शहर धूल, कीचड़, जाम और टूटी सड़कों से जूझ रहा है।
हर घर के सामने नाली नहीं, नाला खोद दिया गया। बच्चे गिरे, बुजुर्ग फिसले, दुकानदारी ठप हुई।
मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का मुआवजा किस फाइल में है?
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को कहना पड़ा कि "मेरे दादा के जमाने की लाइन आज भी चालू है"
113 करोड़ वाला फेल है।
हाईकोर्ट तक को कहना पड़ा कि लापरवाह अफसरों पर FIR दर्ज हो।
सवाल सीधा है -
क्या सरकार सिर्फ "फेल हो गया" कह कर पल्ला झाड़ लेगी?
क्या जिन जिम्मेदार अधिकारियों ने फाइलों पर आंख मूंद कर 50 करोड़ से 112 करोड़ तक लागत पहुंचा दी, उन पर कार्रवाई की कोई योजना है?
ठेकेदार कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा जिन्होंने 15 साल में भी 21 महीने का काम पूरा नहीं किया।
जनता की गाढ़ी कमाई से एक और सफेद हाथी पाला जा सके?